गीता श्लोक

अथ सप्तमाध्याय

श्रीभगवान उबाचो 

मायासक्तोमनह पार्थ योगों 

उनजनमदाश्रया।

असंशय समग्र मां यथा ज्ञास्यसि

तत श्रिण्णु।

अनुवाद

श्री भगवान बोले 

हे पार्थ! अनन्यप्रेम से मुझमें आसक्ति चित्त तथा अनन्य भाबसे मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ तुम जिस प्रकार से हम संपूर्ण विभूति बाल यशवंती गुना से युक्त, सबके आत्म रप मुझको स‌ंशयरहित जानेगा, उसको सुन।। १

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